जिस्मफरोशी : गंदा है पर धंधा है ये

-मजबूरी से हाईप्रोफाइल धंधे तक

बिहारशरीफ। तारीख 12 अक्टुबर,दिन गुरुवार,शाम को अचानक मोबाइल पर घंटी बजती है कि शहर के गढ़पर एक सेक्स रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है।मैंने ज्यादा रिस्पांड नहीं दिया क्योंकि ऐसे भंडाफोड़ खेल अक्सर सुनने में मिल जाता था।शहर में यह धंधा किस किस के गठजोड़ से चलता है यह किसी से छिपी नहीं है।गढ़पर,प्रोफेसर कॉलोनी,रामचंद्रपुर के कुछ बदनाम गलियों का नाम आते ही ढेर सारे ख्याल और सवाल आने लगते हैं। जब गिरफ्त में आयी लड़कियों को देखता हूँ तो यही सोचता हूँ कि आखिर ये सब क्यों करती हैं ऐसे गंदे काम? वह दौर और था जब वक्त के थपेड़ों से घायल होकर अक्सर मजबूर लड़कियां कोठे की शिकार होती थीं, अब तो महज भौतिक संसाधनों की खातिर इस धंधे में लोग उतर चुके हैं। किसी को महंगी कार की चाहत है तो कोई इसे सफलता की शॉर्टकट तरीका मानता है।जिस्मफरोशी,देश के पुराने धंधों में से एक है। अब तो देह व्यापार का धंधा वेबसाइटों के माध्यम से समाज में फैल चुका है।स्पा भी एक माध्यम बन चुका है।हालांकि बिहारशरीफ इतना एडवांस नहीं है लेकिन दलालों के नेटवर्क पावरफुल है। इंफॉरमेशन टेक्नोलॉजी के मामले में पिछड़ी पुलिस के लिए इस नेटवर्क को भेदना खासा मेहनत वाला सबब बन गया है। इस कारोबार में कॉलेज गर्ल्स और बहुत जल्दी ऊंची छलांग लगाने की मध्यमवर्गीय महत्वाकांक्षी लड़कियों की संख्या भी बढ़ रही है। अब दलालों की पहचान मुश्किल हो गई है। मोबाइल पर आने वाली सूचनाओं के आधार पर कॉलगर्ल्स की बुकिंग होती है। मोबाइल पर ही ग्राहक को डिलीवरी का स्थान बता दिया जाता है।जब भंडाफोड़ होता है तो आसपास के लोग कहते है कि हमें तो पहले से ही शक था।जब शक था तो आपने क्या किया।कुछ नहीं सिर्फ प्रतिक्रिया देने के लिए समय निकाला।

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