बेशर्मी की केटली में उबलता शर्म …

-न्यूज़ साइट्स की आड़ में टीआरपी के लिए सेक्स परोसने वाले मीडिया हाउस का भी बहिष्कार होना चाहिए

-भारत में बंद हो सारे एडल्ट साइट्स

बिहार अभ्युदय।यूपी के रामपुर में बेटी के साथ छेड़खानी का मामला हो या बिजनौर में चलती ट्रेन में महिला के साथ जीआरपी के जवान (जानवर) के द्वारा रेप करने का मामला या बिहार के मधुबनी जिले के महादेवगढ़ गांव की नैंसी झा के साथ विभत्स तरीके से निर्मम हत्या करने का मामला,हमेशा बेशर्मी के केटली में उबलता शर्म आज तक क्रांति नहीं ला पायी।अफसोस कि हमेशा गाय, चाय की बात करने वाले भारत मे बलात्कार राष्ट्रीय शर्म का मुद्दा नहीं बन पाता है।सोशल मीडिया पर उबाल भी जाति,धर्म व क्षेत्रीयता के आधार पर फिक्स होती है।साहब,शरीर व आत्मा महिला की छलनि होती है।उबाल हर उस हिन्दुतान की बेटी के लिए होना चाहिए जिसे कुछ बहशी अपने हवस का शिकार बनाते है।इससे बड़ी शर्म की बात क्या होगी कि नया कानून अमल में है लेकिन औरतों पर हमले बेतहाशा हो रहे हैं। एक समाज उन्हें दबंगई से चोट पहुंचाता है तो एक कथित इंसाफ करता हुआ उन्हें निशाना बनाता है।जितनी ज्यादा आधुनिकता आती है उतनी ही पशुता के नाखून बढ़ जाते हैं।सांस्कृतिक उत्पादों का जखीरा जहां से बनता और फैलता है, आज वह बगीचा खुद बदबूदार होता जा रहा है।
ऐसा कोई भी मामला आता है तो वह बस कुछ दिनों तक हमारी बाजुएं फड़कने लगती हैं, “अरे देखो अब देश उबल रहा है,युवा पीढ़ी कुछ करेगी,सरकार कुछ करेगी,लेकिन कुछ नहीं होता।अखबार की सुर्खियां तैयार हो जाती है ‘फलना हम शर्मिंदा है,तेरे कातिल अभी जिंदा है’ और सोसल मीडिया ‘वी वांट जस्टिस’ का हैस टैग लगाकर अपनी जिम्मेदारी को सेफ जोन बताकर अपनी करैक्टर फिक्स कर देते है।हर एक चौक चौराहे पर एक मोमबत्ती भी पूरी नहीं पिघल पाती कि फिर एक घटना बलात्कार की सामने आ जाती है।
इतिहास और सदी की बर्बरता आधुनिक जीवन में एक नए इरादे और नए हमले से लौट आई है।
कानून कितना भी कड़ा कर लीजिए, दफ्तर से लेकर घर तक,खुली सड़क से लेकर ऑटो तक बेटियां आज भी सुरक्षित नहीं है क्योंकि हम उसे सुरक्षित देखना नहीं चाहते।
बार बार हम रेप के विरुद्ध किसी नुस्खे की तलाश में बाहर निकल पड़ते है।अपने अंदर क्यों नहीं जाते, समाज और संस्कृति में जो कूड़ा करकट जमा है, उसे क्यों नहीं झाड़ते।ये तो सड़को की बात हो गयी,घर के अंदर भी वही खेल कुछ जगह जारी है।आए दिन बेटियों व बहनों की इज़्ज़त से खेलने वाला दरिंदा घर मे ही बैठकर समाज को शर्मशार कर रहा है।राखी का मोल आधुनिक दुकानों की प्रोडक्ट्स की तरह है जिसकी कीमत भी राखी के दिन तक ही दिखती है।आत्मा से गंदगी की सफाई का अभियान क्यों नहीं छेड़ देते और ये सब कहने पर कहते हो ये क्या नैतिक तीमारदारी की बात है।सामाजिक व्यवहार आप कैसे बदलते हैं। डंडे और बंदूक और फांसी के दम पर? क्या इनके खौफ से बलात्कारी घर बैठ जाते हैं।क्या उनके भीतर का पशु भाग खड़ा होता है।वे मनुष्य बन जाते हैं?
आज ज़रूरत है एक ऐसे मूवमेंट और मॉमेंटम कि जहां हर कोई उठे और प्रतिरोध की नई चेतना बनाए। इन्हें एक जगह एक वेग में लाने की जरूरत है वरना इस समाज में तो आदमी भले रह जाएं, आदमियत नहीं रहेगी।बचा हुआ कसर आजकल सोशल मीडिया व समाज के ठेकेदार अपनी न्यूज़ साइट्स से पूरी कर देते हैं।क्या ऐसे साइट्स बंद नहीं होने चाहिए।यह एक नयी बीमारी को जन्म दे रहा है जिसका इलाज भी ज़रूरी है नहीं तो आने वाली पीढ़ी बर्बाद हो जाएगी।

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