नालंदा आयुध निर्माणी में दिखा मेक इन इंडिया का इफ़ेक्ट,बचा रहा है देश का 100 करोड़

-रक्षा राज्य मंत्री ने की सराहना,कहा-जल्द शुरू होंगे दो और यूनिट

-समय से पहले नालंदा आयुध निर्माणी में एक लाख बीएमसीएस मॉड्यूल तैयार

राजगीर।मेक इन इंडिया का इससे बेहतरीन उदाहरण और क्या हो सकता है कि स्वदेशी तकनीक के बूते देश का 100 करोड़ रुपया राजगीर स्थित आयुध निर्माणी नालंदा बचा रहा हो। इसकी खुशी आयुद्ध निर्माणी नालंदा के दौरे पर आए देश के रक्षा राज्य मंत्री डा0 सुभाष भामरे के चेहरे पर दिखी।इस मौके पर उन्होंने कहा कि देश की रक्षा प्रणाली से जुड़ी उपलब्धियों में एक नया अध्याय आज जुड़ गया है। लक्ष्य से पहले ही आयुध निर्माणी नालंदा ने नयी टेक्नोलॉजी से छह महीना पूर्व ही एक लाख बीएमसीएस मॉड्यूल का निर्माण कर एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। सुबह 9 बजे उन्होंने आयुध निर्माणी परिसर में पौधारोपण किया। इसके बाद उन्होंने निर्माणी का जायजा लिया और यहां बन रहे प्रोड्क्ट को देखा।उन्होंने पूरे प्रबंधन को बधाई दी और कहा कि आपका एफर्ट्स काबिले तारीफ है। उन्होंने कहा कि यह गर्व की बात है कि अपने आंतरिक अनुसंधान एवं विकास के बल पर आयुध निर्माणी नालंदा ने स्वदेशी बीएमसीएस का सफलतापूर्वक निर्माण कर के दिखा दिया है।उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के मेक इन इंडिया के सपनों को आपने अपनी लगन व ईमानदार प्रयास से पूरा किया है।
पहले विदेशों से बीएमसीएस की खरीदारी पर प्रति मॉड्यूल 19 हजार रूपये का खर्च आता था आज अब अपने देश में ही तैयार करने पर प्रति मॉड्यूल 14 हजार रूपये खर्च आता है। यानि प्रत्येक मॉड्यूल पर 5 हजार रूपये की बचत हो रही है। प्रत्येक वर्ष यदि दो लाख बीएमसीएस तैयार करते हैं तो देश को सौ करोड़ की बचत होती है। इस मौके पर महाप्रबंधक शरद घोड़के ने रक्षा राज्य मंत्री को बीएमसीएस मॉड्यूल भेंट की।रक्षा राज्य मंत्री ने कहा कि जल्द ही दो और यूनिट शुरू किया जाएगा ताकि अधिक प्रोडक्शन शुरू हो सके।
बता दें कि तत्कालीन केन्द्रीय रक्षा मंत्री जॉर्ज फार्णांडीस के बाद श्री भामरे दूसरे रक्षा मंत्री है जिन्होंने नालंदा आयुध निर्माणी का दौरा किया।आयुद्ध निर्माणी नालंदा परियोजना की शुरूआत 1999 में हुयी थी। यहां बनने वाला बीएमसीएस 155 एमएम की आर्टिलरी तोपों में उपयोग होता है, जिसकी मारक क्षमता 5 से 35 किलोमीटर तक है। कारगील युद्ध में ऐसे तोपो की निर्णायक भूमिका से बीएमसीएस का महत्व और भी बढ़ गया है। वर्ष 2017-18 में चार सौ करोड़ रूपये के दो लाख बीएमसीएस उत्पादन करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन उम्मीद है कि तीन लाख मॉड्यूल तैयार कर लेंगे। वर्ष 2016-17 में एक लाख बीएमसीएस का उत्पादन हुआ है। सर्वप्रथम 31 मार्च 2016 को 1804 प्रोड्क्ट भेजा गया था। उन्होंने बताया कि बीएमसीएस बनाने वाला यह एशिया का पहला आयुध कारखाना है। कभी एक समय बंद होने के कगार पर पहुंच गया था यह कारखाना लेकिन आज उपलब्धियों की कहानी हर की जुबान पर है।पहले बीएमसीएस फ्रांस व साउथ अफ्रीका से इम्पोर्ट की जाती थी जिससे देश पर करोड़ों रुपये का एक्स्ट्रा खर्च आता था लेकिन आज सब कुछ अपना है।इस मौके पर आयुध निर्माणी के महाप्रबंधक शरद घोड़के,
डीजीएम प्रवीण कुमार ,कनिष्ठ कार्य प्रबंधक ओपी तिवारी, कनिष्ठ कार्य प्रबंधक गौरी शंकर, कनिष्ठ कार्य प्रबंधक अरविन्द कुमार, कुमार अम्बेदकर, नालंदा विश्वविद्यालय की कुलपति प्रोफेसर सुनैना सिंह, डॉ. कृति, डॉ. विजय कुमार, डीसीएलआर प्रभात कुमार सहित अन्य मौजूद थे।

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