लाइब्रेरी:किताबों की मोहब्बत डिजिटल मत बनने दो बॉस !

पता नहीं लाइब्रेरी में रखी किताबों की मोहब्बत में ‘डिजिटल’ नाम की सौतन की एंट्री कब हो गयी।कौन सा टोना टोटका कर दिया कि लाइब्रेरी जैसे जीवन से आउट ही हो गया है।कभी गलती से भी मन कर जाए तो दोस्त पूछते हैं,कहाँ जा रहे हो?लाइब्रेरी। वहां क्या रखा है। मैंने कहा तू नहीं समझेगा। लाइब्रेरी में रखी किताबें आज भी मुझे अपनी हसरत भरी निगाहों से मेरे आने का इंतजार करती हैं। मैंने किताबो से मोहब्बत की है,इसलिए मुझे उसकी तड़प का अहसास है। दिल की तमन्‍ना है कि कोई आए और उन्‍हें अपने हाथों में समेट ले। वह भी चाहती हैं कि कोई तो फिर ऐसी दीवानगी दिखाए कि उनके साये में उसकी सुबह से शाम हो जाए। वह महसूस करना चाहती हैं प्‍यार की उस सिहरन को, जिनसे एक जमाने में उनकी मोहब्‍बत में डूबे आशिक उन्‍हें छुआ करते थे। अलमारियों के शीशों में बंद किताबें अपनी खामोशी को शायद इसी तरह से बयान करना चाहती हैं पर कुछ कह नहीं पाती। उन्‍हें तो बस अपने गुजरे जमाने के वो आशिक याद आते हैं, जो उन्‍हें पढ़ते-पढ़ते अपने सीने पर सुलाकर खुद भी सो जाया करते थे। ।मुझे आज भी याद है स्कूल के दिनों में जब हाथ में मेरे हमेशा किताबें व कॉमिक्स हुआ करती थी।नोबल्स का क्रेज मेरे जेहन से आज तक नहीं गया है। यही वजह है कि जब भी शहर के एक मात्र लाइब्रेरी में जाता हूँ तो अफ़सोस लगता है कि अब यहाँ किताबों के पढ़ने वाले आशिकों की भीड़ नहीं लेकिन एक भीड़ जमा रहती है जिसे न तो किताबों का कद्र पता है न लाइब्रेरी का महत्त्व। पिछले कुछ सालों में वक्त तेजी से बदला है। लाइब्रेरी समाज की ज़रूरत है जो सभी को बांधकर रखती है। हर मोहल्ले में एक लाइब्रेरी होनी चाहिए ताकि समाज का हर तबका एक प्लेटफार्म में आकर पढ़े। मानता ही कि डिजिटल युग आ गया है बॉस लेकिन किताबों की मोहब्बत डिजिटल मत बनने दो।

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