क्या गांधी के संदेश को सुनेगा तानाशाह किम जोंग

-विश्व को शांति का मार्ग दिखा सकता है शोध पत्र

-नालंदा विवि के डीन प्रोफेसर पंकज मोहन के शोध पत्र से पता चला कोरिया का गांधी कनेक्शन

रजनीकांत।जिस गांधी की विचारधारा व अहिंसा के संदेश के बूते कोरिया ने आजादी हासिल की आज अगर उत्तर कोरिया के तानाशाह किम जोंग उस संदेश को सुन ले या समझ ले तो वह भी विश्व शांति का दूत बन सकता है या उसकी भी छवि सुधर सकती है।यह दावा है नालंदा अंतरराष्ट्रीय विवि के डीन प्रोफेसर पंकज मोहन का जिनके शोध पत्र को पढ़ने के बाद यह पूरे देश व विश्व के लिए बड़े ही सुकून व गर्व की बात होगी।1984 से 1988 में सीओल नेशनल विवि के रिसर्च स्टूडेंट व  1988-89 में पुसान विवि ऑफ फॉरेन स्टडीज में लेक्टरर , 2009 से 2013 तक अकादमी ऑफ कोरियन स्टडीज में डीन व प्रोफेसर रहे पंकज मोहन ने बताया कि 21 नवंबर 1926 में एक कोरियाई अख़बार के संपादक किम संग सू के अनुरोध पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने कोरियाई जनता के लिए संदेश लिखा था जो कोरियाई अख़बार डोंगा-इल्बों में छपी थी जिसमें गांधी ने लिखा था कि ‘मैं बस ये कह सकता हूं कि मैं उम्मीद करता हूं कोरिया अंहिसा के रास्ते पर चलते हुआ आज़ादी प्राप्त करेगा’।ऐसे में गांधी जी का यह संदेश को किंग जॉन सुने और अपने इतिहास से सबक ले तो परिदृश्य बदल जाएगा और पूरे विश्व में बनी संशय की स्थिति की न जाने कब यह शख्स क्या कर ले,खत्म हो जाएगी।यूनिवर्सिटी के डीन प्रोफ़ेसर पंकज मोहन आगे बताते हैं कि कोरियाई स्वाधीनता संग्राम गांधी के विचारों से प्रभावित था।गांधी की तरह वहां के लोग भी असहयोग और स्वदेशी आंदोलन शुरू किया।इन आंदोलनों के नेता चो मन सिक को कोरिया का गांधी कहा जाता है।सिक गांधी के विचारों से प्रभावित थे।प्रोफेसर पंकज मोहन ने बताया कि उन दिनों कोरिया के लोगों को कोरिया भाषा बोलने या टाइटल रखने पर भी सजा मिलती थी।जापान से काफी संघर्ष करना पड़ा था लोगों को।कोरिया के गांधी चो मन सिक का जन्म दक्षिणी प्योंगयोंग में हुआ था जो आज उत्तर कोरिया की राजधानी है। द्वितीय विश्व युद्ध में जापान की हार के बाद कोरिया को दो हिस्सों में बांटने की प्रक्रिया शुरू हुई।ये तय हुआ कि कोरिया के दक्षिणी हिस्से में अमरीका का प्रशासन रहेगा। वहीं, उत्तरी कोरिया का प्रशासन सोवियत संघ के हाथ में जाएगा।लेकिन शीत युद्ध के बाद बदलते शक्ति संतुलन के चलते अमरीका ने 1947 के सितंबर महीने में कोरिया पर शासन के मुद्दे को सयुंक्त राष्ट्र संघ में पहुंचाया और, फ़िर 1948 को यूएन की सामान्य सभा ने कोरियाई गणतंत्र को मान्यता दे दी।इसके बाद साल 1950 में शुरू होने वाला इतिहास के सबसे भयानक युद्धों में से एक माना जाने वाला कोरियाई युद्ध कोरिया के बंटवारे के साथ ख़त्म हुआ।बंटवारे के बाद भी दक्षिण कोरिया में गांधी का महत्व बरकरार रहा लेकिन जिस गांधी की थीम पर कोरिया ने आज़ादी हासिल की  फ़िर ऐसा क्या हुआ कि उत्तर कोरिया में गांधी का महत्व धीरे-धीरे घटते चला गया।इस मुद्दे पर प्रोफ़ेसर पंकज मोहन बताते हैं कि बंटवारे के बाद उत्तर कोरिया में कम्युनिस्ट विचारधारा का विकास हुआ तो वहीं दक्षिण कोरिया में लोकतांत्रिक विचारधारा का उदय हुआ।ऐसे में उत्तर कोरिया की विचारधारा से गांधी के विचार मेल नहीं खाए और गांधी का महत्व कम होता गया।प्रोफेसर पंकज मोहन ने आगे बताया कि हिंदी के बहुत बड़े लेखक राहुल सांकृत्यायन 1934 में कोरिया गए थे और वहां से लौटने के बाद उन्होंने कोरिया वृतांत में लिखा कि कोरिया में गांधी का काफी सम्मान व आदर था,वहां के लोग गांधी जी के बारे में बातें किया करते थे।अब ऐसे में प्रोफेसर पंकज मोहन के शोध पत्र जिसके जरिए आज कोरिया से गांधी का कनेक्शन सामने आया है,इसे विदेश नीति के तहत अंतरराष्ट्रीय पटल व विश्व के सामने लाने की ज़रूरत है ताकि गांधी के संदेश को तानाशाह किम जोंग समझ ले और पूरा देश विश्व शांति की राह पर आगे निकल सके।

 

साभार:राष्ट्रीय सहारा

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