डिग्री नहीं, हुनर की बात करे भारत…

रजनीकांत/बिहार अभ्युदय।आर्यभट्ट,चंद्रगुप्त व चाणक्या की बात करने वाला बिहार आज निराशा व सुसाइड की बात कर रहा है।अरे,ये तो मगहा (मगध) की धरती है मेरे भाई।हार हो या जीत,आवाज़ की बुलंदी में काफी फर्क नहीं पड़ता।एक एग्जाम के रिजल्ट से तुमने अपनी जिंदगी का रिजल्ट तय कर दिया,अपनी जीवनलीला ही खत्म कर दी।यह गलत किया।अरे सेल्युकस की बातों को याद करो जब उसने अपने द्विभाषीय से कहा कि अब हम और चंद्रगुप्त तो संबंधी हो गए ,फिर आवाज़ में इतना गर्जन क्यों है।तब चंद्रगुप्त ने उस द्विभाषीय से कहा था कि जाके कह दो,यह मगहा (मगध) की धरती है,यहां की आवाज़ धीमी नहीं होती।क्या एक रिजल्ट के बाद जीवन समाप्त हो जाती है।हर विद्यार्थी एक न एक बार यह सोचता है कि जो वो पढ़ रहा है, उसकी क्या उपयोगिता है। वर्षों पुरानी लिखी बातों को उसे रटना पड़ता है क्योंकि परीक्षा में नंबर लाने हैं, जिनके आधार पर नौकरी मिलती है। उसे एक ऐसे सिस्टम को मानना पड़ता है, जिसमें उसे वैचारिक आजादी नहीं मिल पाती है। माता-पिता भी इसलिए दबाव डालते हैं क्योंकि समाज में योग्यता मापने का डिग्री/ग्रेड्स पैमाने हैं। कई लड़के-लड़कियाँ इसलिए डिग्री लेते हैं ताकि उन्हें अच्छा जीवन-साथी मिले। पता नहीं आप सभी ने ‘थ्री इडियट्स’ को देखकर आपने अपने लाइफ को किस तरह लिया लेकिन एक किरदार ‘रांचो’ ने जो समझाया वो शायद आप समझ नहीं पाए। वह ग्रेड, मार्क्स, किताबी ज्ञान पर विश्वास नहीं करता है। आसान शब्दों में कही बात उसे पसंद है। उसका मानना है कि जिंदगी में वो करो, जो तुम्हारा दिल कहे। वह कामयाबी और काबिलियत का फर्क अपने दोस्तों को समझाता है। आजकल शिक्षण संस्थान की सच्चाई यही है कि जिंदगी की चूहा-दौड़ में हिस्सा लेने के लिए एक फैक्ट्री की तरह विद्यार्थियों को तैयार करते हैं। उसने सही ही कहा कि ‘इस देश में गारंटी के साथ 30 मिनट में पिज्जा आ जाता है, लेकिन एंबुलेंस नहीं’, ‘शेर भी रिंगमास्टर के डर से कुछ सीख जाता है लेकिन उसे वेल ट्रेंड कहा जाता है वेल एजुकेटेड नहीं’।मोटोवशनल व आध्यात्मिक गुरु ने ठीक ही कहा है कि डिग्रियां नहीं, हुनर चाहिए

सिंपल सा फंडा है करोड़ लोगों को शिक्षित करना चाहते हैं तो शिक्षा के बारे में अपने विचार को बदलना होगा। हम देश में हुनर की बात कर रहे हैं क्योंकि देश की 50 फीसदी से भी ज्यादा आबादी 30 साल से कम उम्र की है जिसे हम युवा कहते हैं। अगर आप इन युवाओं को कोई हुनर नहीं सिखाएंगे तो समझ लीजिए आप इस देश को बर्बादी के रास्ते पर ले जा रहे हैं। युवा ही देश व मानवता का निर्माण करते हैं। किसी देश का युवाओं से भरे होने का मतलब है – वह देश निर्माण की ओर बढ़ रहा है। ऐसे देश को, यानी भारत को अगर आप हुनरमंद नहीं बनाएंगे तो आप उसे बर्बाद कर रहे हैं। तो जल्द ही, अगले पांच से दस सालों के बीच ही, यह सब करना जरूरी है, इसके लिए अगले सौ सालों तक इंतजार नहीं किया जा सकता।
देश में आप इस तरह के लाखों युवा तैयार कर रहे हैं, जिनके पास कोई हुनर नहीं है, लेकिन पढ़े-लिखे लोगों जैसा रवैया है। ये लोग सरकारी नौकरियां और बाबूगिरी चाहते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि यह सब करें कैसे!हमारे यहां देश की वास्तविकता को जाने बिना कानून बना दिए जाते हैं। एक छोटा सा उदाहरण देखिए। अभी हमने ’शिक्षा का अधिकार’ बिल पास किया है। बाल श्रम पर पाबंदी है सो हर कोई स्कूल जाने लगा है। पूरे देश में ही व्यवस्था ऐसी है कि किंडरगार्टन में प्रवेश करके जब तक बच्चा नवीं कक्षा तक पहुंचता है, वह 14 से 15 साल का हो चुका होता है। आप देखेंगे कि ऐसे बच्चों में से करीब 60 प्रतिशत बच्चों में, इतनी क्षमता भी नहीं होती कि वे एक वाक्य ठीक ठाक लिख सकें। अंग्रेजी की बात तो छोड़िए, स्थानीय भाषा में भी वे एक पूरा वाक्य ठीक से नहीं लिख पाते। पांच और चार का जोड़ उनसे पूछिए, वे नहीं बता पाएंगे। उनकी उम्र 14-15 की हो चुकी है। हां, इतना जरूर है कि वे अपने पिता से अलग, पैंट वगैरह पहनना सीख लेते हैं। न वे कभी खेत गए, न उन्होंने कभी बढ़ई का, लोहार का या जो भी उनके पिता का काम है, उसे कभी सीखा। अब 14 साल की उम्र में न तो उनके पास कोई ढंग की शिक्षा है और न ही उनका शरीर इस काबिल है कि वे वापस खेतों में जाकर काम कर सकें, लेकिन हां उनके भीतर शिक्षितों के जैसा रवैया जरूर आ जाता है।इनमें से कइयों ने तो स्नातक तक की पढ़ाई कर ली। इन लोगों को रोजगार नहीं दिया जा सकता, क्योंकि आप एक अरब बीस करोड़ लोगों को शिक्षित तो कर रहे हैं, पर आपके पास उन्हें शिक्षित करने का जो बुनियादी ढांचा है वह अर्पयाप्त है और वह उनमें किसी रोजगार के लिए जरूरी क्षमता या योग्यता नहीं पैदा करता। हम ये क्यों नहीं देखते कि जब कोई पांच साल का बच्चा अपने पिता के साथ खेत पर जाता था, तो वह सिर्फ बाल श्रम नहीं था, शिक्षा भी थी।
दरअसल, शिक्षक उत्तर पढ़ रहे हैं और छात्र दनादन प्रश्नों के उत्तर लिख रहे हैं और परीक्षाएं पास कर रहे हैं। ऐसी शिक्षा प्रणाली में 35 से 40 नंबर लाना कोई बड़ी बात भी नहीं होती।देखिए, हमें इस बात को समझने की जरूरत है कि एक अरब लोग किसी भी देश के लिए एक बड़ी आबादी हैं। शिक्षा के स्तर, हुनर के स्तर, उसकी जटिलताएं और ऐसी ही बाकी तमाम चीजों में आप रातोंरात बदलाव नहीं ला सकते। तो तमाम कानूनों को पश्चिम के मूल्यों के अनुसार पास करने के बजाय हमें धीरज रखना होगा। यह समझें कि जब कोई पिता अपने बेटे को खेत पर ले जाता था, तो वह बाल श्रम नहीं था और ना ही वह उसे श्रमिक की तरह देखता था। वह चाहता था कि बच्चा सब कुछ सीख ले। उसकी कोशिश होती थी कि जो काम मैं कर रहा हूं, मेरा बेटा उसमें महारत हासिल करे ताकि वह मुझसे ज्यादा अच्छी तरह से काम कर सके। यह एक तरह की शिक्षा थी। शिक्षा की इस प्रक्रिया में आपने काम भी किया और यह कोई गलत बात नहीं है।
अब आप सोचते हैं कि आप सभी किसानों को कृषि विश्वविद्यालय में भेज देंगे। ऐसा आप कब तक करने की सोच रहे हैं? इसे करने के लिए आपके पास कितने विश्वविद्यालय हैं? अगर आपने उन्हें विश्वविद्यालयों में भेजने का मन बना भी लिया तो क्या वे उनके लिए काफी होंगे? क्या ये संभव है कि खेती छोडक़र तीन साल की डिग्री लेने के बाद वे बड़े जानकार किसान बन कर लौटें। जिस चीज की जरूरत है, उसका हमारे पास कोई व्यावहारिक ज्ञान नहीं है। हमें हुनर की जरूरत है, शिक्षा की नहीं। किसी भी समाज में केवल 15 से 20 फीसदी लोग ही ऐसे होते हैं, जो पठन-पाठन प्रक्रिया के लिए उपयुक्त हैं। बाकी लोगों को हुनर की आवश्यकता होती है, वे अपनी आजीविका कमाना चाहते हैं। देश में आर्थिक खुशहाली तभी आ सकती है, जब यहां के लोग हुनरमंद होंगे। आज भारत में आपको एक नाभिकीय वैज्ञानिक तो मिल जाता है, लेकिन बढ़ई नहीं मिलता, क्योंकि किसी को प्रशिक्षित ही नहीं किया जा रहा है।आपके पास एक आधुनिक विचार है, शिक्षण के काम को आप ज्यादा सुनियोजित तरीके से करना चाहते हैं। ठीक है इसमें कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन अगर आपके पास कोई विचार है तो उस पर अमल करने के लिए उसे व्यावहारिक भी तो बनाना होगा।उनकी उम्र 14-15 की हो चुकी है। हां, इतना जरूर है कि वे अपने पिता से अलग, पैंट वगैरह पहनना सीख लेते हैं। न वे कभी खेत गए, न उन्होंने कभी बढ़ई का, लोहार का या जो भी उनके पिता का काम है, उसे कभी सीखा।आपको पता ही नहीं कि अपने विचार को कार्यान्वित कैसे करें! आप बस इस विचार को कानून में बदल देते हैं। मैं यह नहीं कहता कि यह गलत है। पर होता यह है कि एक अच्छे विचार की टांग तोड़ दी जाती है। अगर कोई अच्छा विचार है और आप चाहते हैं कि वह काम करे तो आपको यह सोचना होगा कि उसे व्यवहार में कैसे लाया जाए। वह विचार कहीं दूर बादलों पर टिका हुआ है, हर कोई उसे पाना चाहता है पर छू तक नहीं पाता और वह विचार वहीं रह जाता है। शिक्षा के जो भी संसाधन अभी हमारे पास हैं, उनके जरिये हम इतनी बड़ी आबादी को शिक्षित नहीं कर सकते।यह बड़ा महत्वपूर्ण है कि कुछ शिक्षकों को गांव-गांव भ्रमण करते हुए लोगों को पढ़ाने की आज़ादी दी जाए। आधा दिन आप बच्चे को खेती के बारे में पढ़ाएं, खेती के बारे में उन्हें कुछ वैज्ञानिक जानकारी दें, खेती के जो भी औजार उपलब्ध हैं, उन्हें समझाएं कि इन औजारों को बेहतर तरीके से कैसे प्रयोग करना है। बाकी के आधा दिन वह बच्चा अपने पिता के साथ काम करे। ऐसा करके आप अच्छे किसान पैदा कर सकेंगे। दूसरी तरफ आप बच्चे को स्कूल भेज दीजिए, नवीं क्लास तक हर दिन वह किसी कामचोर की तरह काम करेगा, वह घर, खेत और काम से बचेगा और बिना कुछ सीखे-समझे स्कूल में जाकर अपना वक्त बिताएगा। हां इतना जरूर होगा कि वह पैंट पहनने लगेगा और पिता से खुद को बेहतर समझने लगेगा। इस स्थिति को बदलने की जरूरत है। एक अरब लोगों को डिग्रियां थमाकर आप क्या करेंगे! आपको ऐसे लोगों की जरूरत है जो यह जानते हों कि ज़मीन के साथ क्या किया जाता है, आपको ऐसे लोगों की जरूरत है, जिनके पास चीज़ों व सामग्रियों को लेकर कुछ करने की हुनर हो।

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