बाढ़ की ‘विनाशलीला’ ,डूब गया कई जिला,फिर भी नेता जी ‘टॉप’ लागेलु

बिहार में तो राजनीतिक व प्रशासनिक चेतना का तमाशा बन गया है।मैं तो ज़ीरो टीआरपी वाला पत्रकार हूं लेकिन इतनी समझ तो है कम से कम कि फ़ोटो फ्रेम वाले नेता व अधिकारी बाढ़ पीड़ितों के सेवा के नाम पर आधा बिना मंजन किए हुए दांत किस लिए चमका रहे है।प्राकृतिक आपदा के रोना रोने वाले थोड़ा ताइवान से सीख ले जहां बिजली संयंत्र में जेनरेटर खराब होने के बाद द्वीप के लाखों मकानों की बिजली चले जाने के चलते ताइवान के आर्थिक मामलों के मंत्री ने इस्तीफा दे दिया।खैर इतना बड़ा कलेजा तो नहीं ही होगा किसी नेता व मंत्री के पास सिवाय यह कहने के कि सरकार ने काफी प्रयास किए।अगर और स्कोप होता तो यह कहने में भी झिझक नहीं होती कि इसमें विदेशी शक्ति का हाथ है।सैकड़ों लोग मर गए,लाखों बेखबर है,कितने आंकड़ों को छिपाया गया होगा यह तो ईश्वर ही बेहतर जानते होंगे।कोसी की विनाशलीला की कहानी कोई नयी बात नहीं है,नयी बात तो यह है कि जिले के आलाधिकारी हवा हवाई रिपोर्ट बनाकर बैठे थे।बाढ़ आ गयी और देश ने बिहार की वो विनाशलीला देखी जिसको देखने के बाद हर कोई एक पल के लिए बेचैन हो जाएगा।भिक्षाटन की ग्राउंड रियलिटी किसी से छिपी नहीं है कि कितनी ईमानदारी से ब्रांड पार्टी वाले नेता भिक्षाटन कर रहे है।अखबार में जगह मिल जाए, बड़े नेता शाबाशी दे दें और फिर जे है से की हइये है।टीवी पर देख रहा था कि स्थानीय लोग जनप्रतिनिधि के नहीं आने से कितने नाराज़ है।लेकिन सच्चाई तो यही है कि गलत लोग का चुनाव करेंगे तो यही हाल होगा।समाज व राज्य की समृद्धि के लिए आए धन तो घोटालों में चला जाता है,आमजन के विकास की चिंता किसे है।बिहार में बाढ़ का कहर जितना कुदरती है उससे ज्यादा यह सरकारों के काम करने के तरीके, पूर्व तैयारी और प्रबंधन में घोर लापरवाही का सबूत है। अब तक सौ से ज्यादा लोगों की मौत की खबरें आ चुकी हैं और इसके लिए सरकारी महकमों की लापरवाही और आपदा प्रबंधन का लचर तंत्र जिम्मेवार है। यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि भूकम्प के बरक्स बाढ़ कभी अचानक नहीं आती, इसके संकेत पहले से ही मिलने लगते हैं। लेकिन शायद ही कभी सरकारों ने इससे बचाव के लिए पर्याप्त पूर्व तैयारी की जरूरत महसूस की हो। नतीजतन, बाढ़ जब अपनी तीव्रता के साथ इलाकों में फैलती है तो बहुत कुछ तबाह कर डालती है। कुदरत के चक्र को रोका नहीं जा सकता, पर इस तरह की तबाही जरूर कम की जा सकती है।बाढ़ से जन-जीवन तबाह होना आमतौर पर हर साल की त्रासदी है। लेकिन इस वर्ष बिहार के उत्तर-पूर्वी इलाके में बाढ़ की विभीषिका ने एक बार फिर 2008 में कोसी इलाके में बाढ़ से हुई जान-माल की तबाही की याद दिला दी है। यह तथ्य सभी जानते हैं कि हर साल मानसून आते ही नेपाल के पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश होती है। फिर बरसात का पानी कोसी, बागमती और नारायणी नदियों से होते हुए बिहार के मैदानी इलाकों तक पहुंचता है।अमूमन हर बार बाढ़ की विभीषिका झेलने के बाद भी सरकार और आपदा प्रबंधन महकमों को कोई सबक लेना जरूरी नहीं लगता है।

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