हॉर्न हेरिटेज राज्य काहे नहीं घोषित कर देते…

बिहार अभ्युदय:पगला, बतलाहा,दिमागे सनसना दिया।ऐसे भी कोई अलबलाता है क्या।इतना हॉर्न कि कान का चदरा फाड़ देता।आधा लाइफ का इरिटेशन तो इन हॉर्न बजाने वाले गैंग ने कर दिया है।फ्रस्टेटिया गए हैं।कहाँ है एमवीआई वाले पदाधिकारी जो पूरे ईमानदारी से घूस का रुपया ले लेकर इनको लाइसेंस दे दिया है।किसी को ट्रैफिक सेंस व रूल के बारे में इंटरव्यू लेकर लाइसेंस देना चाहिए।कोई सरकार या कानून है जो बिहार को बिना हार्न के रहना सीखा सकता है। वैसे तो इस मामले में पूरे भारत का रिकार्ड ख़राब है लेकिन बिहार तो लगता है जैसे हार्न बजाने को उत्सव मान चुके है। यहां की सड़कों पर चलिये तो लोग इस कदर हार्न बजाते मिल जायेंगे जैसे शहर हॉर्न हेरिटेज घोषित हो।कौन कहता है भारत में सहिष्णुता खत्म हो गयी है।इससे बड़ा सहिष्णुता और क्या होगा कि इतने हॉर्न के प्रेसर के बाद भी अपना ब्लड प्रेशर बढ़ाकर चुपचाप झेल लेते है।पूरा शहर इस कदर हार्न पर टूट पड़ा है जैसे किसी विश्व सुंदरी ने स्वयंवर के लिए सभी को आमंत्रित किया हो। कार से लेकर बाइक तक में हार्न बजाने की सुविधा न हो तो ट्रैफिक में फंसे बिहार के लोग अपनी गाड़ी से उतर कर पैदल चलने लग जाएं। हमें पता है कि रास्ता नहीं है। अगली कार के पास विकल्प नहीं है मगर अगली कार और पिछली कार दोनों में हार्न से ही सड़क पर ध्वनि संवाद में पीछे नही रहते।हॉर्न का इशारा भी लोग खूब समझते है।अगला हॉर्न बजाकर कहता है चल हट, अगला कहता है चल निकल।बाकि खून जलाकर गरियाते हुए निकल जाता है।बुद्ध की धरती पर हॉर्न का युद्ध,गजबे है भाई।

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