शिक्षा की आत्मा को समझे,यह व्यवसाय नहीं, मिशन है

डॉ. नीतू नवगीत:शिक्षा व्यवसाय नहीं बल्कि एक मिशन है । स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि जिस शिक्षा से हम अपना जीवन निर्माण कर सकें, मनुष्य बन सकें, चरित्र गठन कर सकें, और विचारों का सामंजस्य कर सकें, वही वास्तव में शिक्षा कहलाने के योग्य है । लेकिन व्यवसायिकता के दबाव में शिक्षा दम तोड़ रही है । जिन विद्यालयों में देश का भविष्य सुरक्षित है, उन्हीें विद्यालयों में पैसे का खुला खेल खेला जा रहा है । लूट की एक समानांतर व्यवस्था तैयार कर दी गई है जिसमें अभिभावक लूटते रहे और शिक्षा की दुकान चलाने वाले लोग रातोरात धन्नासेठ बनते चले जाएं । ऐसी व्यवस्था भारत के भविष्य को कमजोर बना रही है । लॉर्ड मैकाले की परिकल्पनाओं से चल रही यह व्यवस्था अभी भी उपनिवेशकों के स्वार्थ को मजबूत करने वाली है । इससे भारत देश और भारतीय संस्कृति को किसी प्रकार का लाभ नहीं मिल रहा । तमाम प्रयासों के बावजूद देश बदल नहीं पा रहा तो इसका सबसे मूल कारण यह है कि शिक्षा व्यवस्था में मूलभूत बदलाव नहीं लाया जा सका है । वस्तुतः शिक्षा में बदलाव से ही भारत देश बदलेगा ।एक समय था कि ह्वेनसांग और फाह्यान जैसे विदेशी तक्षशिला , नालंदा और विक्रमशिला जैसे भारतीय शिक्षण संस्थानों में आकर शिक्षा ग्रहण करते थे । वहां उन्हें विज्ञान, समाज और इतिहास के साथ साथ संस्कारों की भी शिक्षा मिलती थी । लेकिन अंग्रेजी पद्धति की शिक्षा प्रणाली में सांस्कृतिक मूल्यों को उपेक्षित कर दिया गया । अंग्रेजों ने जानबूझकर भारतीयों द्वारा गर्व किए जाने वाले मामलों को नजरअंदाज किया । सुनियोजित साजिश के तहत यहां के विज्ञान को घटिया करार दिया गया । महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों को भी उपहास का विषय वस्तु बना दिया गया । भारतीय शासकों के योगदान को भुलाते हुए विदेशी आक्रांताओं की उपलब्धियों से इतिहास की पुस्तकों को भर दिया गया । ऐसा एक सुनियोजित साजिश के तहत किया गया ताकि हम अपनी पुरातन संस्कृति और शासन व्यवस्था पर गर्व न कर सकें । ऐसा एक दिन में नहीं हुआ । अपितु लंबे समय तक लगातार पाश्चात्य दर्शन पर आधारित मतों की प्रतिस्थापना के लिए भारतीय मूल्यों की बलि चढ़ाई गई । फलत: 20वीं सदी की कई पीढ़ियां अंग्रेजों की कुत्सित मंशा और खतरनाक साजिशों का शिकार होती चली गईं । चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक और समुद्रगुप्त की उपलब्धियां गौण कर दी गईं और सिकंदर तथा नेपोलियन के बारे में खूब पढ़ाया गया । उन्हें महान से महानतम का दर्जा दिया गया । इसी तरह सिंधु घाटी सभ्यता की वैज्ञानिक वास्तुकला को उपेक्षित किया गया । वैदिक गणित का मजाक उड़ाया गया । चरित्र निर्माण से संबंधित पुराण कथाओं को तिलिस्मी और झूठ का पुलिंदा करार दिया गया । अंग्रेजों द्वारा संचालित अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने वाले लोग धीरे-धीरे उन्हीं बातों को सच मानने लगे, जो उन्हें पढ़ाया गया । बाद में यही विद्यार्थी शिक्षक बने । फिर क्या था । भारतीय शिक्षकों ने भी बच्चों को वही पढ़ाया जो अंग्रेज चाहते थे । 1947 में अंग्रेज चले गए । लेकिन शिक्षा में वही पुरानी पद्धति चलती रही । वही शिक्षक अंग्रेजों की बातें स्वतंत्र भारत में भी पढ़ाते रहे । देश के लिए कुर्बानी देने वाले भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, वीर सावरकर और बाल गंगाधर तिलक के जैसी हस्तियों को आतंकवादी के रूप में अंग्रेजों ने निरूपित किया था । स्वतंत्र भारत में भी वह निरूपण जारी रहा । जाहिर सी बात है कि यदि देश की आजादी के लिए अपने प्राणों का न्यौछावर करने वाले लोग आतंकवादी के दर्जा पाते रहें तो उससे अधिक शर्मनाक बात और क्या हो सकती है । फिर जिन बच्चों को ऐसी बातें पढ़ाई गई, उनका मन-मस्तिष्क भी गंदा हुआ । किसी ब्लैक बोर्ड पर कोई बात ना लिखी हो तो उस पर कोई भी नई बात लिखना आसान होता है । लेकिन यदि गलत बात लिख दी जाए तो उसे मिटा कर नई बात लिखने में काफी मेहनत लगता है । कई दफे पुरानी बातें जेहन में ऐसे घर कर जाती हैं कि उसको मिटा पाना भी संभव नहीं हो पाता है । इसलिए बहुत जरूरी है कि विद्यालयों की शिक्षण व्यवस्था में व्यापक सुधार किया जाए । व्यवसायिकता की अंधी गलियों में विचरण कर रही व्यवस्था को खुलेपन के मैदान में लाया जाए । तभी हम शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय; असतो मा सद्गमय’ को प्राप्त कर पाएंगे ।

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