‘मॉब लिंचिंग’ इज ‘पिनचिंग नाउ’ !

रजनीकांत।सोशल मीडिया पर इधर कुछ दिनों से जुनैद व अयूब पंडित की भीड़ के द्वारा की गई हत्या को लेकर काफी डिबेट चल रहा है।हर कोई अपने अपने हिसाब से लॉजिक गढ़कर एक परसेप्शन तैयार करने की कोशिश कर रहा है।यह ठीक नही है।भारत में आये दिन सामने आ रही मॉब लिंचिंग कहाँ तक जायज है।
भारत में पिछले तीन वर्षों में मॉब लिंचिंग की वारदातों में तेजी आयी है।मरने वाला हिन्दू है या मुसलमान यह मुद्दा कैसे हो सकता है जबकि भारत में बात इंसानियत की होती है।इस कदर नफरत,अरे भाई याद रखो ‘कत्ल हिन्दू का हुआ,खुदा शर्मिंदा हुआ,मारे तो मुस्लिम भी गए,राम कहाँ जिंदा रहा’।याद रखो,ऊपर वाला तो उसे भी दो वक्त की रोटी देते है जो उनका नाम नहीं लेता,फिर उनके द्वारा बनाये गए चीजों से इतनी नफरत क्यों है।
शिवप्रसाद जोशी ने मेड फ़ॉर माइंड में क्या खूब लिखी है कि
इस भीड़ को सत्ता और ताकत की सुनियोजित भीड़ ने निगला है। गहरी चोट से त्रस्त लोकतंत्र को अब तबाही की ओर धकेला जा रहा है। एक शर्मनाक खामोशी और ‘हमें क्या’ वाला नजरिया भी कमोबेश उतना ही सघन होता जा रहा है।मीडिया खासकर टीवी ने तो एक अलग ही माहौल तैयार करने की फिराक में लगी है।
भीड़ हमारे व्यवहार को नियंत्रित और संचालित कर रही है।भीड़ ही तय कर रही है कि कौन सही है कौन गलत।क्या हम एक ‘प्रोवोक्ड’ समाज हैं? हमें उकसा देना और हत्यारा बना देना आसान हो चला है?यही भीड़ पश्चिम बंगाल में वाम सत्ता के दौरान सैकड़ों सह नागरिकों को मारने निकली थी, यही भीड़ पटना में राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं की परस्पर खूनी टकराहट बन जाती है।यही भीड़ तेलंगाना और हाशिमपुरा और भोपाल का कोहराम बन जाती है, यही भीड़ अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा देती है और इधर कभी लव जेहाद तो कभी गाय बेचने, काटने और खाने के नाम पर नागरिकों पर कहर ढा रही है।
श्रीनगर में डीएसपी की हत्या करने वाली भीड़ का भी एक घिनौना चेहरा है जैसे सदियों से इस देश में औरतों पर हमलावर, पुरुषवादी वर्चस्व का बर्बर चेहरा है। गैंगरेप से लेकर चुड़ैल और डायन कहकर औरतों पर टूट पड़ने वाली भीड़, इसी लोकतंत्र से निकली है।ये भीड़ दरअसल एक आपराधिक गैंग में तब्दील हो जाती है। तारीख दर तारीख इन घटनाओं की तफ्सील गिनाने का यहां औचित्य नहीं, लेकिन इन डरावनी मिसालों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि भीड़तंत्र का ये उभार एक धीमी और जहरीली प्रक्रिया है जो इधर और तीखी और उग्र और सांप्रदायिक हुई है।एक बड़े सार्वभौम मानवीय मकसद से अलग जब यही भीड़ एक घिनौनी नफरत भरी सांप्रदायिकता में जमा होती है तो ये लोकतांत्रिक व्यवस्था के खिलाफ ये एक आपराधिक अराजकता है। भारत में कभी इसे ठीक से समझा नहीं गया और हर बार इस पर पर्दा डालने की कोशिश की गई।जनचेतना पर सत्ता व्यवस्था ने पहले पहरे बैठाये और फिर उसे पालतू बनाने की कोशिश की। एक जागरूक नागरिकता, एक उन्मादी और जघन्य या तमाशा देखती भीड़ में कैसे तब्दील हो सकती है, लोकतंत्र की हिफाजत के सबक के तौर पर इसे भी देखा जाना चाहिए।लोकतांत्रिक राष्ट्र के रूप में भारत के सामने अब सबसे बड़ा खतरा इसी बात का है कि कबीलाई किस्म की स्वेच्छाचारिता और निरंकुशता जड़ जमा चुकी है जो हर उस चीज की बरबादी पर तुली है जिसका संबंध दया, करुणा, इंसाफ और इंसानियत से है। इसकी अनदेखी के गुनहगार सब हैं।मान्यताओं से निकला भस्मासुर हमें ही निगलने फैल गया है। ये फासीवाद नहीं तो और क्या है।इस व्यापक खूंखारी के बाद अब क्या ऐसा वक्त आने ही वाला है जब सामूहिक मारकाट मचेगी।आज अगर इस स्वेच्छाचारी और कानून से बेखौफ जहांतहां उभर आती भीड़ को काबू में करने के जतन नहीं किये जाते तो पतन निश्चित है।बात सरकार के रहने और न रहने की नहीं है, बात सिर्फ देश की छवि और प्रतिष्ठा की भी नहीं है, बात मनुष्यता और लोकतंत्र पर मंडराते खतरे की है। हाइपर मीडिया समय में सरकारें आधा चुप्पी आधा हरकत दिखाकर कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर सकती।सियासी फायदों के लिए नागरिक विवेक का अपहरण किया गया। लोगों के जेहन में घृणा और बंटवारे के बीज पड़ चुके थे।खून की ये फसल क्या किसी को दिखती है?सरकारें भले ही बदल जाएं लेकिन लहुलूहान नागरिकता के घाव भरने का बुनियादी और सच्चा काम तो तभी होगा जब सही मायनों में नागरिक विवेक बहाल होगा वरना तो राष्ट्र, धर्म, रंग, जाति आदि के आधार पर पनपती भीड़, देश और उसकी आत्मा को ही निगल लेगी। और देश की आत्मा उसके नागरिकों में निवास करती है किसी चित्र, नारे, मतदाता या सत्ता में नहीं।

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