छठ में आ रहे हो न बेटा, जी माई …

हैलो,प्रणाम माँ,खुश रहो बेटा।इस बार छठ में घर आ रहे हो न बेटा ? जी माई,पर आप की आवाज़ क्यों भारी सी लग रही है।बेटा,अब उम्र हो गया है ,चाहते हैं कि इस बार तुम ज़रूर आओ,आओगे न बेटा।यह सिर्फ एक माँ की आवाज़ या पुकार नहीं है बल्कि बिहार में छठ करने वाली हर माँ की आवाज़ है जो बिहार या बिहार से बाहर रह रहे अपने बेटो को फोन करके बस यही पूछती है कि बेटा तुम छठ में घर आ रहे हो न।यह एक ऐसा पर्व है जिसमें पूरा माहौल व वायुमंडल पवित्र हो जाता है।लोग तमाम फासलों को पाटकर एक हो जाते है।  छठी मैया की जय, जल्दी-जल्दी उगी हे सूरज देव., कईली बरतिया तोहार हे छठी मैया,दर्शन दीहीं हे आदित देव,कौन दिन उगी छई हे दीनानाथ, जैसे गीत सुनाई देते ही बस एक ही इच्छा होती है कि कब घर जल्दी पहुंचे।यह ऐसा पूजा विधान है जिसे वैज्ञानिक दृष्टि से लाभकारी माना गया है। ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से कि गई इस पूजा से मानव की मनोकामना पूर्ण होती है। सूर्य नारायण और भगवती शक्ति (प्रकृति) की उपासना का पर्व छठ पूजा पर उगते हुए सूर्य के साथ अस्ताचलगामी सूर्य को भी अ‌र्घ्य देने की परंपरा है, जो हमें सभी के प्रति उदारता बरतने और सभी को सम्मान देने का संदेश देती है। छठ-पूजा ऐसा लोकोत्सव है, जो हमें मन-वचन-कर्म की पवित्रता की प्रेरणा देता है, साथ ही प्रकृति के साथ हमारा जुड़ाव मजबूत करता है।

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