चिट्ठी न कोई संदेश,जाने वो कौन सा देश…

ऐ डाकिया बाबू,क्या है री, छः महीना होई गवा ख़त नहीं आया।बोल क्या लिखूँ।डाकिया डाक लाया,कुछ याद आया।ट्रिंग, ट्रिंग,ट्रिंग।कैसे सायकल की घंटी बजते ही भाग कर गेट पर जाता था कि मेरी चिट्ठी आयी है।अब तो कभी कभी फिल्मों में ही दिख जाती है या सुनने को मिल जाती है।संदेशे आते है,चिट्ठी आयी है,आयी है,चिट्ठी आयी है।चिट्ठी न कोई संदेश,जाने वो कौन सा देश।डाकिया बाबू को बर्दी में देखे तो एक जमाना हो गया।पत्र भावनाओं का प्लेटफार्म था जहां लोग शब्दों से अपनी बातों को लिख डालते थे।नाना,मां,मौसी व बहन के खत का हमेशा इंतिज़ार रहता था।होस्टल में था तो एक पोस्ट कार्ड मिलता था।आदरणीय पिता जी,सादर चरण स्पर्श,मैं यहां कुशल से हूं, आशा करता हूँ कि आप भी कुशल से होंगे,हा, हा, हा।सही पूछो तो मेरी हिंदी भी लेटर लिखने की आदत से ही ठीक हुई।अब तो व्हाट्स एप व फेसबुक है।उपर से मंगल फॉन्ट में हिंदी लिखने का ऑप्शन।अब कहाँ वो वाली बात राह गयी।छोटा था तो देखता था,कोई अपने बच्चे के पत्र तो कोई पति या पत्नी की प्रेम पत्र पाने के संभावनाओं से ललक भरी दृष्टि से डाकिया की ओर आश भरी नज़रें उठाकर गलियों के किनारे झाँकने लगते थे। हर किसी को चाह रहती थी की उसके अपनों की सलामती की खबर डाकबाबू ले कर आएंगे। डाकबाबू की सभी से बहुत लगाव होता था। डाकबाबू सभी को पहचानते भी थे।नाम से जानते थे और उनको पता होता था की किसका डाक किसके लिए और क्या खबर लेके आया होगा। खाकी वर्दी सर पे टोपी कंधे पर लटका झोला और सायकल औसतन हर डाकिया को लोग भी दूर से ही पहचान लेते थे।अब तो चिट्ठी लिखना पास्ट टेन्स जैसे हो गया है , जैसे यह इतिहास की बात हो।अब तो याद आई और बात कर लिए. व्याकुलता तो कम हुई है लेकिन वह जो प्रतीक्षा में आनंद था वो अब कहाँ? माता-पिता अपने बच्चों का पत्र प्राप्त कर जिस तरह आनन्दित होते थे उस तरह आज आधुनिक उपकरण में कहाँ? अपने मन की बातें जो हम चिट्ठी में लिखते थे , वह अब कहाँ? हम अपनी अभिव्यक्ति लिखकर सम्बन्धों में अत्यन्त निकट थे। आज हम आलसी हो गए हैं, चिट्ठी लिखने के कारण हमें लिखने का अभ्यास होता था, जिससे हम लेखन कला में कुशल होते थे।लिखने के कारण शब्द शक्ति की पकड़ मजबूत होती थी। लिखावट सुन्दर होती थी। भावना व्यक्त करने की अप्रतिम क्षमता होती थी, अब तो यह विलुप्त ही गयी है।

Top
Copy Protected by Chetan's WP-Copyprotect.