कोई पागल कहता है कोई आवारा कहता है,राजनीति का स्तर तो,अब …..लगता है

क्या यह वही बिहार है जिसने पूरे विश्व को ज्ञान की रोशनी दी थी,क्या यह वही बिहार है जहां एक अध्यापक ने चंद्रगुप्त को देश का सिरमौर बना दिया,क्या यह वही बिहार है जिसने देश की राजनीति की दिशा दशा बदल दी।क्या जेपी का आंदोलन भूल गए।कितने शर्म की बात है कि नेताओं ने राजनीति को धर्म नहीं समझा बल्कि धर्म की राजनीति शुरू कर दी।जिस तरह शब्दों का व्यपार चल रहा है उससे तो यही लगता है कि राजनीति बस एक उद्द्योग बनना बाकी रह गया है। राजनीतिक बयानों का स्‍तर मर्यादा के स्‍तर को तो कब का पार कर चुका, अब यह सारी सीमाएं लांघता दिख रहा है। ‘पलटू राम-सलटू राम’ से ‘घसीटा राम’ तक। बड़का मोदी,छोटका मोदी,बड़बड़ मोदी,गड़बड़ मोदी,अफवाह मंत्री और न जाने क्या क्या।इस पर भी मन नहीं भरा तो पागल’ से ‘आवारा कुत्‍ता’ तक पहुंचा दिया। आवारा व अल्सेशियन कुत्‍ते का
ताजा मामला लालू प्रसाद ने शुरू किया तो जदयू के बयानवीरों ने तो रिस्पांड भी उसी तरीके से किया।उदाहरण देखिए, ”बचकर रहिएगा लालू जी ऐसा काटेंगे कि कहीं इंजेक्शन भी नहीं मिलेगा।” मामला थोड़ा और बढ़ा और बयान भी। ”हम ऐसे लोग हैं जो सीने पर चढ़कर मुंह तक नोंच लेते हैं”।इन सारी खीझ की बजह भी सभी को पता है,महागठबंधन के टूटना।अब यही राजनीति की मर्यादा है तो बिहार का भला जीवन में नहीं होगा।

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