अब तो पॉलिटिकल टूरिज्म को एन्जॉय करें नेता जी !

रजनीकांत।राजनीति को वैसे संभावनाओं व अनिश्चितता की दुनिया कही जाती है,जहां हर दिन नए नए प्रयोग से एक सफल ऑर्गेनिक प्रोडक्ट्स बाहर निकलते है।प्रयोग तो हम भी कर रहे है।कुछ वर्षों से टीवी पर चल रहे डिबेट्स व घटनास्थल पर नेताओं की जाने की होड़ ने एक नए टर्म को जन्म दिया है,नाम है ‘पॉलिटिकल टूरिज्म’।यहां प्राकृतिक सौंदर्य तो नहीं मिलेगा मगर मुद्दों को सुंदर ढंग से गढ़ने के लिए शब्द ज़रूर मिलेंगे।जिसने जितने अच्छे से मुद्दों को हिंसा में बदलकर,विपक्ष को गरिया लिया समझों उसका पॉलिटिकल टूरिज्म का टारगेट पूरा हो गया।हिंसा व दंगा के हिसाब से पॉलिटिकल पैकेज तैयार होगा।हिंसा व दंगा का आशय सिर्फ धर्म से नहीं है,जातीय हिंसा भी शामिल है।दलित व महादलित के घर भोज से लेकर उनकी हत्या व दबंगों के द्वारा पिटाई व शासन खामोश वाली सिचुएशन वाली सीन भी क्रिएट करनी है।मतलब पॉलिटीवुड ।नहीं समझे,बॉलीवुड की तरह है।वहां हीरो एक्टिंग करता है यहां नेता।नेता जी का भ्रमण व सिर्किट हाउस में भोजन क्या उस गरीब को भी मिलेगा जिसकी बजह से आपने टीआरआई बटोर ली नेता जी।क्या जिस किसान की आत्महत्या के बाद अपने टीवी व अखबारों में संवेदनाओं का फाउंडेशन लगाकर चेहरा चमकाया,क्या उस किसान के किसी एक व्यक्ति को भी घर पर बुलाकर या उनकी समस्याओं का समाधान निकाला है।जवाब,नहीं है।रेप विक्टिम के नाम को बेचकर ऊँचाई तक पहुंचने वाले नेता यह बताने की जहमत उठाएंगे कि खुद की सफलता के बाद उसके लिए क्या किया।नहीं, बस पर्यटन।ऊपर से आए दिन कोई न कोई नेता या संवैधानिक प्रमुख, अपने ठोंगे से मूंगफली की तरह उलट कर सुझाव बांटने लगता है कि प्लीज पॉलिटिक्स न करे।कश्मीर का राग अलापने के लिए मीडिया दरबार है ही,मुफ्त में इनकी बेशर्मी वाली लॉजिक सुनते रहिए।

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